दिनकर का सम्पूर्ण विश्व को, आलोकित करना फ़िर छिपना;
शशि का मणिसमान तारों संग, निशि में शीतल मन्द महकना।
वृक्षों पर हर वर्ष नई कोंपलें, पत्र पुष्प फल लगना;
झड़ना पतझर में फ़िर, ऋतु परिवर्तन से पल्लवित संवरना।
स्वेदज अण्डज उद्भिज, और जरायुज जीव जन्तु का बनना;
आयु के अनुरूप नित्यप्रति, बढ़ना और अन्तत: मरना।
यही कालगति नैसर्गिक, सम्पूर्ण चराचर में घटती है;
इससे ही सम्पूर्ण विश्व की, सारी गतिविधियां चलती हैं।
काल कर्म के वश में है तो, आओ अपना कर्म संवारें;
मनुज जन्म है कर्म का अवसर, है प्रारब्ध इसीसे बनना।
6 comments:
bahut hi acchi rachna hi..
aapka blog jagat men swagat hai...
bahut accha likhte hain aap.......
अक्षय-मन
हिन्दी चिठ्ठा विश्व में आपका हार्दिक स्वागत है, खूब लिखें, मेरी शुभकामनायें…
Kaal ki sahi vyakhya ki hai aapne. Swagat blog parivar aur mere blog par bhi.
नववर्ष् की शुभकामनाएं
कलम से जोड्कर भाव अपने
ये कौनसा समंदर बनाया है
बूंद-बूंद की अभिव्यक्ति ने
सुंदर रचना संसार बनाया है
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लिए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com
ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है!
मेरी शुभकामनाएं!
मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है.
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