
दृश्य १-
होली पे गुलाल सब ग्वाल बाल खेल रहे,
गोपियों ने लीन्हीं आज हाथ पिचकारी है।
गोकुल के ग्वाल- बाल गोपियों से दूर खड़ी,
छोर से निहारे वृषभानु की दुलारी है॥
हाथ पिचकारी नहीं प्रेम रंग में है रंगी,
आई बरसाने से ये राधिका कुमारी है॥।
खोज रही कान्हा कू सुध देह की बिसार,
भीज रही वाकी कञ्चुकी और सारी है॥॥
दृश्य २-
ऊधो बलराम संग फाग का आनन्द लेते,
गोपियों के बीच घिर आए बनवारी हैं।
कोऊ पीतपट खींचे कोऊ है गुलाल मलै,
कोऊ ने है छीन लीन्हीं वाकी पिचकारी है॥
दृश्य ३-
राधिका ने गोपियां हटाय दीन्हीं एक मांहीं,
जाय कान्हां पास वाकी आरती उतारी है।
रंग संग फाग तन खेल रहे राधा- कृष्ण,
सार नन्दगाँव जाय रहा बलिहारी है॥
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