रचनाएं कैसे बनती हैं?
रचनाएं ऐसे बनती हैं………….
भाव विह्वल हो कर मनुश्य जब एकाकी होता है,
प्रकरण कोई बार बार मन पर हावी होता है
विविध रूप घटना के मन में विकसित हो सहसा ही
चित्र कोई मानस पर उसका सम्पादित होता है।
ऐसे में यदि मनुज पत्र पर निज भाषा शब्दों में
भावपूर्ण मन से लिख डाले कोई छन्द या दोहा
उसका वो ही चित्र लेखनी से उस भाव विह्वल की
पाठक अथवा श्रोता के मन पर अंकित होता है।
अभिव्यक्ति भावों की ये ही कविता कहलाती है,
पाठक के मन पर ये सहज प्रभाव छोड़ जाती है।
Saturday, February 7, 2009
कविता
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- डॉ. जय प्रकाश गुप्त
- डॉ. जय प्रकाश गुप्त शिक्षा- चिकित्सा- स्नातक (महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय रोहतक) पर्यावरण (Environmental Education)- परास्नातक (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र) पत्रकारिता (Journalism & Mass Comm)- परास्नातक (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र) PGDT (KUK) चिकित्सकीय वृत्त- Intern- श्री मस्तनाथ सामान्य चिकित्सालय, अस्थलबोहर (रोहतक), सामान्य अस्पताल, अम्बाला छावनी | चिकित्साधिकारी (पूर्व)- जनलाभ धर्मार्थ चिकित्सालय, अम्बाला छावनी, सेवा भारती चिकित्सालय अम्बाला छावनी | चिकित्सक- भगवान महावीर धर्मार्थ चिकित्सालय, अम्बाला छावनी, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अम्बाला छावनी | लेखकीय वृत्त- संपादन- महाविद्यालय पत्रिका (आयुर्वेद प्रदीप)- छात्र संपादक (English Section), INTEGRATED MEDICINE (Monthly Medical Magazine) प्रकाशन- कविता- लेख- कहानी- व्यंग्य अनेकों पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित; चिकित्सा, शिक्षा, धर्म, संस्कृति, मनोविज्ञान विषयक १६ शोधपत्र प्रकाशित | समीक्षा- अनेकों कविता संग्रह, लेखमाला ग्रंथों की समीक्षा | अमृतकलश चिकित्सालय, हाऊसिंग बोर्ड कालोनी, अम्बाला छावनी | ईमेल- chikitsak@rediffmail.com, c
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