अपनी बहन बहू बेटी को, भेजोगे तुम Pub में?
नग्न वसन से नहलाओगे क्या मदिरा के Tub में?
नहीं तो प्यारे मत इतना तुम शोर मचाओ,
संस्कृति मर्यादा को कुछ तो कहीं बचाओ।
जिस समाज में नैतिकता का क्षय होता है,
पाप कई पीढ़ियों वह समाज ढोता है।
माना तुम गुलाम हो चुके भाषा से हो,
हिन्दु नहीं रह पाए तुम परिभाषा से हो;
आशा और विश्वास जिन्हें अब भी है तुम पर,
अपना नहीं तो उनका ही विश्वास बचाओ।
नहीं तो प्यारे मत इतना तुम शोर मचाओ,
संस्कृति मर्यादा को कुछ तो कहीं बचाओ।
2 comments:
अच्छा लिखा है आपने ,पर दोष कहीं न कहीं हमारा है ...
हम बच्चों को वो संस्कार नहीं दे रहे ,हमारी महत्वाकाक्षाएँ इस तरह हावी हैं की विवेक खो गया है ,अच्छे और बुरे की समझ से दूर लाभ शार्टकट से किस तरह पाया जा सकता हैये सर्वोपरि हो गया है .
अपनी बहन बहू बेटी को, भेजोगे तुम Pub में? नग्न वसन से नहलाओगे क्या मदिरा के Tub में?
नहीं! नहीं!! नहीं!!!
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