Thursday, February 12, 2009

अपनी बहन बहू बेटी को, भेजोगे तुम Pub में?

अपनी बहन बहू बेटी को, भेजोगे तुम Pub में?

नग्न वसन से नहलाओगे क्या मदिरा के Tub में?

नहीं तो प्यारे मत इतना तुम शोर मचाओ,

संस्कृति मर्यादा को कुछ तो कहीं बचाओ।

जिस समाज में नैतिकता का क्षय होता है,

पाप कई पीढ़ियों वह समाज ढोता है।

माना तुम गुलाम हो चुके भाषा से हो,

हिन्दु नहीं रह पाए तुम परिभाषा से हो;

आशा और विश्वास जिन्हें अब भी है तुम पर,

अपना नहीं तो उनका ही विश्वास बचाओ।

नहीं तो प्यारे मत इतना तुम शोर मचाओ,

संस्कृति मर्यादा को कुछ तो कहीं बचाओ।

2 comments:

ज्योत्स्ना पाण्डेय said...

अच्छा लिखा है आपने ,पर दोष कहीं न कहीं हमारा है ...
हम बच्चों को वो संस्कार नहीं दे रहे ,हमारी महत्वाकाक्षाएँ इस तरह हावी हैं की विवेक खो गया है ,अच्छे और बुरे की समझ से दूर लाभ शार्टकट से किस तरह पाया जा सकता हैये सर्वोपरि हो गया है .

ज्योत्स्ना पाण्डेय said...

अपनी बहन बहू बेटी को, भेजोगे तुम Pub में? नग्न वसन से नहलाओगे क्या मदिरा के Tub में?


नहीं! नहीं!! नहीं!!!

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डॉ. जय प्रकाश गुप्त शिक्षा- चिकित्सा- स्नातक (महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय रोहतक) पर्यावरण (Environmental Education)- परास्नातक (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र) पत्रकारिता (Journalism & Mass Comm)- परास्नातक (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र) PGDT (KUK) चिकित्सकीय वृत्त- Intern- श्री मस्तनाथ सामान्य चिकित्सालय, अस्थलबोहर (रोहतक), सामान्य अस्पताल, अम्बाला छावनी | चिकित्साधिकारी (पूर्व)- जनलाभ धर्मार्थ चिकित्सालय, अम्बाला छावनी, सेवा भारती चिकित्सालय अम्बाला छावनी | चिकित्सक- भगवान महावीर धर्मार्थ चिकित्सालय, अम्बाला छावनी, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अम्बाला छावनी | लेखकीय वृत्त- संपादन- महाविद्यालय पत्रिका (आयुर्वेद प्रदीप)- छात्र संपादक (English Section), INTEGRATED MEDICINE (Monthly Medical Magazine) प्रकाशन- कविता- लेख- कहानी- व्यंग्य अनेकों पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित; चिकित्सा, शिक्षा, धर्म, संस्कृति, मनोविज्ञान विषयक १६ शोधपत्र प्रकाशित | समीक्षा- अनेकों कविता संग्रह, लेखमाला ग्रंथों की समीक्षा | अमृतकलश चिकित्सालय, हाऊसिंग बोर्ड कालोनी, अम्बाला छावनी | ईमेल- chikitsak@rediffmail.com, c